सोमवार, 9 मई 2011

अंधविश्वास के खिलाफ एक मुहिम

अंधविश्वास के खिलाफ एक मुहिम
तर्कशील बनने का आह्वान

अजय कुमार सोनी की राममूर्ती स्वामी के साथ बातचीत

परलीका. इंसान अगर अंधविश्वास का रास्ता छोड़कर तार्किक विचारों की तरफ अपना रुख करले तो वह एक अच्छा इंसान माना जाता है। ये बात तर्कशील सोसायटी के प्रांतीय प्रतिनिधि राममूर्ति स्वामी ने हमारे साथ हुई बातचीत में कहा।
उनके अनुसार तर्कशील सोसायटी, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब की टीम भारतीय मुद्रा के दो लाख रुपए संसार के किसी भी ऐसे व्यक्ति को देने के लिए वचनबद्ध है। जो धोखा रहित अवस्थाओं में अपनी दिव्य अथवा आलौकिक शक्ति का प्रदर्शन सोसायटी की शर्तों में से किसी भी एक अथवा अधिक को पूरा करके दिखा सकता है। सभी देव पुरुष, साधु, योगी, सिद्ध, गुरू, तांत्रिक, स्वामी, ज्योतिषी एवं कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने आध्यात्मिक त्रऎिया-कलापों, प्रभु भक्ति अथवा वरदान से कोई दिव्य शक्ति प्राप्त की हो, इस पुरस्कार को जीत सकता है।

आइए हम आज पढ़ते हैं स्वामी से बातचीत के कुछ अंश।
सवाल:- आपने तर्कशील सोसायटी की ओर कब आगमन किया और आपको ऐसा क्या लगा जिससे आप सोसायटी में आए?
जवाब:- हम जिस सामाजिक परिवेश में रहते हैं, अड़ोस-पड़ोस के वातावरण, गली-मोहल्लों की भूत-प्रेत की घटनाएं, चारों तरफ अंधविश्वास फैलाने वालों के नाटक, पाखंडी लोगों द्वारा समाज की लूट, आलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले लोगों के कारनामे, मदारियों के खेल बचपन से ही मेरे दिमाग को झकझोरते थे। मेरे दिमाग में हमेशा एक ही प्रश्न उभरता था कि हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है और इसी झुंझलाहट ने मेरे दिमाग में कब, कहां, क्यूँ और कैसे? जैसे शब्दों की पृष्ठभूमि का वातावरण तैयार किया। मैं ये सोचता था कि इनमें कोई चमत्कार नहीं है। क्यूंकि ये लोग वही चीज पेश कर रहे हैं जो दुनिया में पहले से मौजूद है। कोई नई चीज अपनी शक्ति द्वारा उत्पन्न नहीं करते हैं। शुरू से ही मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ। विज्ञान में गहरी रूची से मिथ्या बातों के खण्डन के प्रति मेरा रूझान बढ़ा। लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से मुलाकात नहीं हो पाने के कारण सक्रिय रूप से कुछ न कर सका। संयोग से मैंने डॉ. ए.टी. काबूर की पुस्तकें मुझे पढ़ने को मिली और तर्कशील सोसायटी के बारे में जानकारी हासिल हुई। इसी समय हनुमानगढ़ जिले के जण्डावाली गांव के समाजसेवी तर्कशील डॉ. रूपसिंह से मुलाकात हुई और उनकी विवेकशीलता ने मेरी शंकाओं का समाधान कर मुझे तर्कशील बनाया।
सवाल:- सोसायटी का मूल उद्देश्य क्या है?
जवाब:- सोसायटी का मूल उद्देश्य समाज को अंधविश्वास से निकाल कर वैज्ञानिक चिंतन पैदा करना है। जिससे लोग वैज्ञानिक विचारधारा अपनाकर पाखंडियों की लूट से बच सकें। सामाजिक समन्वय, अंधविश्वास रहित स्वच्छ वातावरण का निर्माण हो सके। मिथ्या विश्वासों से पर्दा उठे और समाज सच्चाई की ओर बढ़े।
सवाल:- पूरे भारत में सोसायटी की कितनी इकाइयां कहां-कहां काम कर रही है?
जवाब:- तर्कशील सोसायटी अलग-अलग नामों से पूरी दुनियाभर में काम कर रही हैं। पंजाब और राजस्थान में तर्कशील सोसायटी, हरियाणा में रेशनलिस्ट सोसायटी, कहीं बुद्धिवादी समाज, अंधविश्वास निरोधक दस्ता के नाम से अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रही हैं। राजस्थान में भी लगभग 20 इकाइयों के सैंकड़ों सक्रिय सदस्य काम कर रहे हैं और हजारों की संख्या में समर्थक हैं।
सवाल:- भूत-प्रेत, ओपरी-पराई की कसरें क्यों होती हैं? खासकर महिलाओं में। सोसायटी के क्या विचार हैं?
जवाब:- तथाकथित ओपरी-पराई की कसरें सामाजिक समन्वय के अभाव में उपजी मनोविकृतियों के कारण होती हैं। पुरुष प्रधान समाज में घर के सारे काम-काज की जिम्मेवारी, बच्चों के पालन-पोषण की, शिक्षा का अभाव, मानसिक बोझ महिलाओं पर ज्यादा होता है। ऊपर से घर की कलह, नशे़डी ऐबी पुरुष की उपस्थिति से उसके दिलों में घुटन घोट बनकर उभरती हैं। यही कारण है कि ये परिस्थितियां महिलाओं में ज्यादा होती हैं। घरों में पत्थर गिरना, कपड़े कटना, आग लगना इसी सामाजिक समन्वय के अभाव में उपजी मानवीय शरारतें होती हैं। जिनके पीछे कोई आलौकिक शक्ति का हाथ नहीं होता है।
सवाल:- ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए सोसायटी क्या तरीका अपनाती है?
जवाब:- मनोविकृतियों को दूर करने के लिए रोगी से गहन पूछताछ कर स्कूलिंग द्वारा और जरूरत पड़ने पर सम्मोहन विधि द्वारा उसका ब्रेन वॉश किया जाता है। सम्मोहन नींद में रोगी को भरोसा दिलाया जाता है कि उसकी सारी समस्याएं ठीक हो जाएंगी। वास्तविक कारण की खोज कर उसके निवारण हेतु उचित सुझाव भी दिया जाता है। पत्थर गिरना, आग लगना, कपड़े कटना जैसी परिस्थितियों में तहकीकात द्वारा शरारती को पकड़ा जाता है और उसकी कुंठाओं का समाधान कर उसका नाम गुप्त रख कर के समस्या से छुटकारा दिलाया जाता है।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

पाखाना कि खजाना

रामगढ़ की तर्कशील सोसायटी ने किया रहस्योद्घाटन

गायब हुआ धन पाखाने की कुंई में खोज निकाला

विनोद स्वामी व अजय सोनी
परलीका. घर में बना पाखाना परिवार का गायब हुआ धन उगलने लगा तो देखने वाले हैरान रह गए। घटना हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के भगवान गांव की है। महेन्द्र सिहाग के घर से गत नौ माह से रुपए, जेवर तथा अन्य सामान गायब हो रहा था। जिसे वे दैवीय आपदा या प्रेत-बाधा मानते रहे और झाड़-फूंक वाले सयाणों के चक्कर में पड़े रहे। आखिरकार 16 दिसंबर गुरुवार की रात रामगढ़ की तर्कशील सोसायटी ने रहस्योद्घाटन किया तथा गायब हुआ धन पाखाने की कुंई में खोज निकाला।
सोसायटी ने परिवार के सभी सदस्यों, आस-पड़ोस तथा अन्य संबंधित लोगों से गहन पूछताछ कर हकीकत का पता लगाया और यह रहस्योद्घाटन किया। सोसासटी ने इसे महज मानवीय शरारत माना है तथा शरारती का नाम पूर्णतया गोपनीय रखा गया है। ग्रामीणों की मानें तो इस घटना के बाद उनका जंत्र-मंत्र, डोरा-डांडा व ओझा-सयाणों से विश्वास उठ गया है।

यूं रहा घटनाक्रम

गत मार्च माह में महेन्द्र की पत्नी की सोने की अंगूठी गायब हो गई। इसे उन्होंने भूल से कहीं रखी मानकर या सामान्य चोरी मानकर संतोष कर लिया। फिर घर पर रखे नगदी रुपए अक्सर कम होने लगे। शाम को अगर पांच हजार रुपए कहीं से लाकर रखते तो सुबह तीन हजार ही मिलते। अगस्त 2010 में अचानक घर में ऐसी घटना हुई कि सारे गांव में चर्चा का विषय बन गया। घर से करीब 9 तोला सोने तथा आधा किलो चांदी के गहने संदूक से गायब हो गए। इस घटना से सभी घरवालों के मन में भय व्याप्त हो गया। पास-पड़ोस, रिश्तेदारों से राय आने लगी कि घर में कोई छाया या ओपरी का प्रभाव है। इसे कोई सयाणे को दिखाओ। इसके बाद वे अलवर के एक सयाणे के पास गए जिसने चार किलो घी जोत के लिए व 20 हजार रुपए मांगे और समस्या के समाधान का जिम्मा लिया। इसी क्रम में झुंझुनू, बींझबायला, पल्लू, रावतसर, लखूवाली इत्यादि दर्जनभर गांवों के झाड़-फूंक, डोरा व तंत्र-मंत्र वालों के चक्कर काटते रहे। वे लोग अपनी-अपनी पूजा-पद्धत्ति व पाखंड से उनसे प्रसाद व जोत के खर्चे के साथ-साथ नगदी तक की मांग करते रहे। किसी ने पड़ोसियों को चोर ठहराया तो किसी ने घर में ही रोग बताया। किसी ने भूत-प्रेत की बाधा तो किसी ने इसे ओपरी का नाम लेकर डर पैदा किया। नोहर के एक पुजारी, ऐलनाबाद के कम्प्यूटर से जंत्री बनाने वाले पंडितजी तथा अबोहर की तांत्रिक औरत द्वारा हिजरायत में अपराधी को दिखाने सहित पल्लू में जोत वाले बाबा ने उनके डर व मानसिक भय को और ज्यादा बढ़ा दिया।
यह सिलसिला रुका नहीं तथा घर में रोज ऐसी घटनाएं होने लगी। घर से रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी गायब होने लगा। ताला-चाबी से लेकर बच्चों के स्कूल बैग व तणी पर सूखते कपड़े गायब होने लगे। पूरा परिवार भय से विचलित हो गया। सयाणों ने सलाह दी कि यह घर छोड़ देने में ही परिवार का भला है। अचानक होने वाली इन घटनाओं के पीछे इस परिवार ने कोई आलौकिक शक्ति का हाथ मान लिया तथा इससे मुक्त होने के लिए पाखंडियों के धक्के चढ़ते रहे।
एक रिश्तेदार ने रामगढ़ की तर्कशील सोसायटी के बारे में बताया तो फोन पर संपर्क कर सारी घटना से सोसायटी को अवगत कराया। दिसंबर माह की 11 तारीख को अन्वेषण शुरू हुआ। सोसायटी के सदस्यों की बातों पर इस परिवार को शुरू में यकीन भी नहीं हुआ। तर्कशील सोसायटी के प्रांतीय प्रतिनिधि राममूर्ति स्वामी, रामगढ़, गोगामेड़ी तथा परलीका गांव की तर्कशील टीम सदस्यों ने भगवान गांव जाकर पूरी स्थिति का जायजा लिया और इस परिवार को भरोसा दिलाया कि घर के पाखाने की कुंई में सारा सामान मौजूद है। बैटरी की रोशनी से वहां देखा गया तो कपड़े जैसा कुछ दिखाई दिया।
अगले दिन सुबह जब ग्रामीणों ने कुंई का चौका हटाकर सामान निकालना शुरू किया तो मौके पर मौजूद ग्रामीण हैरत में पड़ गए।
ग्रामीणों ने तर्कशील सोसायटी के राममूर्ति स्वामी, महेन्द्र सिंह शेखावत, रामकुमार कस्वां, दलीप सहू, आत्मप्रकाश स्वामी, विनोद स्वामी, लीलूराम व अजय को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

भगवान गांव में पाखाने से रुपए व जेवर निकालते समय मौजूद ग्रामीण।
पाखाने से निकले रुपए।
पाखाने से निकले सोने-चांदी के जेवर।
तर्कशील टीम के साथ परिवार के लोग व ग्रामीण।

क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं

तर्कशील सोसायटी के अनुसार इस प्रकार की घटनाओं के पीछे किसी प्रकार की आलौकिक शक्ति का हाथ नहीं होता वरन सामाजिक समन्वय के अभाव में उपजी खंडित मानसिकता की मानवीय शरारतें होती हैं। भगवान गांव की घटना में भी इसी प्रकार की मानवीय शरारत है। तर्कशील सोसायटी का मानना है कि ऐसी शरारत एक मानवीय भूल होती है, अत: शरारती को सुधरने का मौका मिले तथा वह समाज मेें उचित मान-सम्मान से जी सके इसलिए नाम गोपनीय रखा जाता है।

मतिभ्रम का मनोवैज्ञानिक खेल है हिजरायत

तथाकथित तांत्रिक दर्पण, नाखून या दीपक में उस परिस्थिति या घटना को दर्शाने का दावा करते हैं, जो अक्सर छोटे बच्चों को दिखाई जाती है और यह एक मतिभ्रम का मनोवैज्ञानिक खेल है। इसका सहारा लेकर पाखंडी लोग लोगों को मूर्ख बनाते हैं। इसमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं होती है। दर्पण, कालिख लगे नाखून या दीपक की जोत में एकटक बिना पलक झपके देखते हैं तो शुरू मे जो वस्तु सामने होती है वही दिखाई देती है, पर लगातार एक ही तरफ देखने से ऑप्टिक नर्व थक जाती है और उसमें सुन्न होने लगती है और दिमाग को वह पहले जो संदेश दे रही होती है वह नहीं दे पाती। बल्कि बालक के अचेतन में ऐसा संदेश एक रील की भांति पहले से ही चलता रहता है जो उसने पहले सुन रखा हो। फलस्वरूप उसे वही घटना दिखती प्रतीत होने लगती है।

धार्मिक श्रद्धा का नाजायज लाभ

सोसायटी के प्रांतीय प्रतिनिधि राममूर्ति स्वामी का मानना है कि तांत्रिक व पाखंडी आदि लोग धार्मिक श्रद्धा का नाजायज लाभ उठाते हैं और ऐसे पीडि़त परिवारों को एक-दो चीज डराने वाली दिखाकर अपने प्रभाव में ले लेते हैं। वे जादू का सहारा लेकर आग लगना, नींबू से खून टपकना, रेत की चुटकी से पानी मीठा करना, हाथ में चीजें गायब करना आदि दिखाकर प्रभाव उत्पन्न करते हैं। दूसरी तरफ किसी बड़े लाभ का लालच देकर अपनी लूट का शिकार उन्हें बनाते हैं। इससे पूर्व में भी सोसायटी ऐसी सैकड़ों घटनाओं का समाधान कर चुकी है। बौद्धिक वर्ग अपने चिंतन का उपयोग सामाजिक परिवेश को बदलने में करे तो वह दिन दूर नहीं जब समाज में अंधविश्वास रहित स्वच्छ वातावरण का निर्माण होगा।

प्रतिबंध लगे पाखंडियों पर

''पांखडियों का जाल दिनोदिन बढ़ता जा रहा है और इन पर कोई अंकुश नहीं है। सरकार को चाहिए कि इन पर प्रतिबंध लगाया जाए और कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए।'' -साहबराम सिहाग, ग्रामीण, भगवान।

रिपोर्टर के मोबाइल नम्बर : 9829176391(Vinod Swami), 9602412124(Ajay Soni)
प्रांतीय प्रतिनिधि राममूर्ति स्वामी के मोबाइल नंबर- 8104313679

शुक्रवार, 28 मई 2010

परलीका रा आशु कवि छोगसिंह री वाणी में राजस्थान महिमा सुणो सा....

मंगलवार, 11 मई 2010

मनुज देपावत रो जन-गीत "धोरां वाला देश जाग रे"

गुरुवार, 6 मई 2010

'मुळकती माटी' बणी सिरताज


नेठराना गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान) पद पर कार्यरत जितेन्द्र कुमार सोनी 'प्रयास' संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2009 में चयनित घोषित हुए हैं। इसी वर्ष अपने प्रथम प्रयास में ही आरएएस पुरुष वर्ग में टॉपर रह चुके सोनी ने आयोग की ओर से गुरुवार को घोषित परिणाम में देशभर में 29 वां स्थान प्राप्त किया है।
रावतसर तहसील के धन्नासर गांव में 29 नवम्बर 1981 को जनमे सोनी ने इस अवसर पर कहा कि उनका बचपन से संजोया हुआ सपना साकार हो गया है तथा ऐसी कोई उपलब्धि नहीं जिसे मेहनत के दम पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह परिणाम सिद्ध करता है कि राजस्थान और खासकर हनुमानगढ़ जिले में शिक्षा के संदर्भ में बहुत बड़ी जाग्रति आई है और सोनी की इस सफलता से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।
सोनी ने सिद्ध कर दिया है कि हिन्दी माध्यम, ग्रामीण पृष्ठभूमि या सरकारी स्कूल में पढ़कर भी सफलता के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है और अगर कोई इंसान कड़ी मेहनत करता है तो निश्चित तौर पर हर लक्ष्य उसे छोटा नजर आता है।

साहित्यकारों में खुशी का माहौल

स्थानीय साहित्यकार सत्यनारायण सोनी, रामस्वरूप किसान, मेहरचंद धामू व विनोद स्वामी ने सोनी की इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की है। गौरतलब है कि सोनी हिन्दी व राजस्थानी के चर्चित युवा कवि भी हैं तथा इनका कविता संग्रह 'उम्मीदों के चिराग' प्रकाशित हो चुका है। इंटरनेट पर सोनी की राजस्थानी कविताओं का ब्लॉग 'मुळकती माटी' भी काफी चर्चित हुआ है। गत दिनों नई दिल्ली में आयोजित सार्क सम्मेलन में भी सोनी भाग ले चुके हैं तथा अगले वर्ष पाकिस्तान में आयोजित हो रहे विश्व साहित्यकार सम्मेलन में भी इन्हें आमंत्रित किया गया है। सोनी इन दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय से 'विकास के गांधीय प्रतिमान' विषय पर पीएच.डी. भी कर रहे हैं।


शनिवार, 24 अप्रैल 2010

राजस्थानी रचनाकारां सारू सूचना

राजस्थानी रचनाकारां सारू सूचना

राजस्थानी जन-जन ताईं पूगै इण सारू बोधि प्रकाशन पुस्तक पर्व योजना रै तै'त 'राजस्थानी साहित्य माळा' छापण री तेवड़ी है। इण योजना में राजस्थानी रा दस रचनाकरां री एक-एक पोथी रो सैट ऐकै साथै प्रकाशित होय सी। ऐ दस पोथ्यां कहाणी, नाटक, एकांकी, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य, रेखाचित्र, निबंध, कविता, गज़ल आद विधा में होय सी। साफ है एक विधा में एक टाळवीं पोथी। कुल दस पोथी रै एक सैट री कीमत 100/- (सौ रिपिया) होय सी। इण पोथी माळा रो संयोजन राजस्थानी रा चावा साहित्यकार श्री ओम पुरोहित 'कागद' नै थरपियो है।

योजना में सामल होवण सारू 15 मई, 2010 तक इण ठिकाणै माथै रुख जोड़ो-

श्री ओम पुरोहित 'कागद'
24, दुर्गा कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम-335512
खूंजै रो खुणखुणियो : 9414380571

बोधि प्रकाशन
एफ-77, सेक्टर-9,
रोड नं.-11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया,
बाईस गोदाम, जयपुर

रविवार, 28 मार्च 2010

परलीका के प्रगतिशील किसान लालसिंह बैनीवाल पुरस्कृत

परलीका के प्रगतिशील किसान लालसिंह बैनीवाल पुरस्कृत

25 हजार का पुरस्कार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया

यहां के प्रगतिशील किसान लालसिंह बैनीवाल को कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में हनुमानगढ़ जिला स्तर पर उल्लेखनीय कार्य करने पर कृषि विभाग राजस्थान की ओर पुरस्कृत किया गया है। गौरतलब है कि कृषि क्षेत्र में नवीनतम प्रयोग कर विशेष उत्पादन प्राप्त करने पर लालसिंह को पूर्व में भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

रविवार को जयपुर के पंत कृषि भवन में आयोजित राज्य स्तरीय कृषक सम्मान समारोह में लालसिंह को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, कृषि मंत्री हरजीराम बुरड़क तथा कृषि राज्य मंत्री भरोसीलाल जाटव ने 25 हजार रुपयों का चैक तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। समारोह में मुंडा (हनुमानगढ़) के अमरसिंह सिहाग को भी 25 हजार का हनुमानगढ़ जिला स्तरीय पुरस्कार तथा भादरा के महावीर सैनी, बोझला (भादरा) के तुलछाराम, बुधवालिया (नोहर) के धर्मवीर सिहाग तथा ढाबां (संगरिया) के कृष्ण जाखड़ को 10-10 हजार रुपयों के पंचायत समिति स्तरीय पुरस्कार प्रदान किए गए।
फोटो- जयपुर के पंत कृषि भवन में लालसिंह को पुरस्कृत करते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, कृषि मंत्री हरजीराम बुरडक

शनिवार, 20 मार्च 2010

जिंदगी में रस घोल दिया शहद ने

जिंदगी में रस घोल दिया शहद ने

परलीका क्षेत्र में एक दर्जन युवा किसानों ने बनाया आजीविका का साधन

परलीका (हनुमानगढ़). हनुमानगढ़ जिले के परलीका व रामगढ़ गांवों के किसानों व शिक्षित युवकों का रुझान मधुमक्खी पालन की ओर बढ़ रहा है और इलाके के करीब एक दर्जन नौजवानों ने इसे व्यवसाय के रूप में अपनाया है। युवा किसानों के अनुसार यह व्यवसाय किसानों के लिए काफी लाभप्रद साबित हो रहा है और शहद ने उनकी जिंदगी में रस घोल दिया है।
परलीका में इसकी शुरुआत प्रगतिशील युवा किसान मुखराम सहारण ने की। वे वर्ष 2005 से लगातार शहद उत्पादन कर रहे हैं। शुरू में जानकारियों के अभाव में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, मगर बाद में कृषि एवं उद्यान विभाग व कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा उपलब्ध सुविधाओं तथा प्रशिक्षण से यह व्यवसाय काफी आसानी से होने लगा है। मुखराम से व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर इसी गांव के युवक सतवीर बैनीवाल तथा नरेश जांगिड़ ने भी इस व्यवसाय को अपनी आजीविका का साधन बनाया है। समीपवर्ती रामगढ़ ग्राम में युवक मीठूसिंह, सज्जन राहड़, सुरेन्द्र भाम्भू, बगड़ावतसिंह भाम्भू, पवन नैण आदि भी पूर्ण सफलता के साथ शहद उत्पादन कर रहे हैं। इन किसानों के पास मधुमक्खियों के 200 से अधिक बक्से हैं जिन्हें अब तक सरसों के खेतों में रखा गया था और अब हरियाणा के किन्नू-माल्टा बागानों में भेज दिया गया है।
शहद उत्पादकों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से दिया जाने वाला अनुदान व अन्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं तथा राज्य सरकार की उदासीनता से यह व्यवसाय अधिक प्रगति नहीं कर पा रहा है। सरकार अगर पर्याप्त सहयोग करे और सम्बन्धित उपकरण व तकनीकों की जानकारी उपलब्ध करवाए तो इस व्यवसाय से शहद के साथ-साथ मोम, रायलजैली, मोनोविष आदि का भी उत्पादन सम्भव है।

हनुमानगढ़ जिले में 150 इकाइयां स्थापित
कृषि विज्ञान केन्द्र संगरिया के विषय विशेषज्ञ (पौध संरक्षण) डॉ. उमेश कुमार का कहना है कि हनुमानगढ़ जिले में मधुमक्खी पालन की लगभग 150 इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में बीटी कपास के क्षेत्रफल में वृद्धि होने से कीटनाशकों का प्रयोग 30 प्रतिशत तक कम हुआ है, जिस कारण से इस व्यवसाय को भी अपरोक्ष रूप से अच्छा लाभ हुआ है और शहद का उत्पादन भी बढ़ा है। इस वर्ष शहद के भाव बढऩे से भी उत्पादकों का हौसला बढ़ा है। उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों के लिए मधुमक्खी पालन पर प्रतिवर्ष पांच दिवसीय नि:शुल्क प्रशिक्षण शिविर आयोजित करता है। इसी प्रकार उद्यान विभाग प्रति बक्से पर 400 तथा प्रति कॉलोनी 350 रुपयों का अनुदान भी देता है।
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''मधुमक्खी पालन एक लाभप्रद रोजगार है, जिसे खेतीबाड़ी के साथ-साथ सहायक धन्धे के रूप में भी अपनाया जा सकता है। इस व्यवसाय से मधुमक्खी पालक को जहां आर्थिक लाभ होता है, वहीं आस-पास के किसानों की फसलों में मधुमक्खियों द्वारा होने वाले प्राकृतिक परागण से 10 से 20 फीसदी तक अतिरिक्त उत्पादन होता है।''
-सज्जन राहड़, मधुमक्खी पालक, रामगढ़।
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''मैं घणो पढेड़ो कोनी, पण मेरै खातर ओ रोजगार वरदान साबित होयो है। कई नौजवान साथी ईं काम नै मिलगे कर सकै। बेरोजगारी गै जमानै में आज हाथ पर हाथ धरगे बैठणै गी बजाय ईं तरियां गा रोजगार करणा चइयै।''
-मुखराम सहारण, मधुमक्खी पालक, परलीका।
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''मधुमक्खी प्रकृति के अनमोल खजाने को बटोरकर हमें पेश करती है। मधुमक्खी प्रकृति के फूलों से मकरन्द एकत्र कर शहद, रायलजैली, मोम मोनोविष आदि उपलब्ध कराती है जो कि आर्थिक रूप से लाभकारी है तथा स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद है।''
-नरेश जांगिड़, मधुमक्खी पालक, परलीका।

फोटो- 1. परलीका में बक्सों से शहद निकालते हुए मधुमक्खी पालक। 2. डॉ. उमेश कुमार 3. सज्जन राहड़ 4. मुखराम सहारण 5. नरेश जांगिड़।
रिपोर्टर : अजय कुमार सोनी

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

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