गुरुवार, 20 नवंबर 2008

क्रांतिकारी कवि शंकरदान सामौर (जयंती विशेष)

क्रांतिकारी कवि शंकरदान सामौर
जयंती विशेष (२२ नवम्बर)

'सगळां रा सिरमौड़, ओळखीजै ठौड़-ठौड़' विरुद से विख्यात कवि शंकरदान सामौर को कौन नहीं जानता। वे आधुनिक युग के बड़े और क्रान्तिकारी कवि थे। आपका जन्म २२ नवम्बर १८२४ को चुरू जिले की सुजानगढ़ तहसील के बोबासर गांव में हुआ। आप राजस्थानी के पहले ऐसे राष्ट्रीय कवि हैं, जिनका काव्य देशभक्ति के भावों से ओतप्रोत है। आपके काव्य में अंग्रेजों के विरोध में लड़ने वालों के लिए सम्मान का सुर बहुत ऊंचा है। इस क्रांतिकारी कवि की जोश भरी वाणी ने फिरंगियों को झकझोर कर रख दिया था। ये अपने जीवन काल में इतने विख्यात हुए कि उनके डिंगल गीतों को लोगों ने लोकगीतों की तरह अपनाया। उनके गीत देशभक्तों के सच्चे मित्र हैं तो वहीं देश-द्रोहियों और दुश्मनों पर बंदूक की गोली की तरह वार करते हैं।

'संकरियै सामौर रा, गोळी हंदा गीत।
मिंत'ज साचा मुलक रा, रिपुवां उळटी रीत।।'

ऐसे क्रांतिकारी कवि की बहुत सी रचनाएं आज भी नौजवानों में जोश भरने का काम करती हैं। 'सगती सुजस', 'वगत वायरो', 'देस-दरपण' और 'साकेत सतक' आपकी प्रसिठ्ठ रचनाएं हैं।
आचरणवान कवि होने के कारण वे नमन करने योग्य तो थे ही और सत्य कहने की हिम्मत के कारण पूजनीय भी थे। अन्य कवियों की तरह उन्होंने राजाओं का महिमागान नहीं किया। अंग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं को उन्होंने खरी-खरी सुनाई। बीकानेर महाराजा को तो फटकार लगाते हुए उन्होंने यहां तक कह डाला कि-

'डफ राजा डफ मुसद्दी, डफ ही देस दिवांण।
डफ ही डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यो डफ बीकांण।।'

कविरूप में सामौर ने देश पर आए अंग्रेजी संकट से समाज को सावचेत किया, तो युग-चारण के रूप में इस संकट से समाज का ख्याल रखने में भी पीछे नहीं रहे। जब जरूरत पड़ी तब उन्होंने तागा, धागा, तेलिया और धरणा जैसे सत्याग्रह भी किए। शंकरदान सामौर सामन्ती व्यवस्था की अनीति के खिलाफ भी तीन बार धरने में शामिल हुए। क्योंकि अपनी मौत से नहीं डरने वाला यह जनकवि अनीति का हर स्तर पर विरोध करने को ही जीवन का धर्म मानता था-

'मरस्यां तो मोटै मतै, सो जग कैसी सपूत।
जीस्यां तो देस्यां जरू, जुलम्यां रै सिर जूत।।'

आपने संघर्ष के लिए कविता को हथियार बनाया, लोगों में गुलामी से जूझने का सामर्थ्य भरा। सामौर ने देश की कविता को नया अर्थ दिया, नए विचार दिए। वे गौरी सत्ता के विद्रोही और विप्लवी कवि थे। लोगों ने उनको 'सन् सत्तावन रा कवि' कहकर सम्मान दिया। उनकी कविता में अंग्रेजों के खिलाफ राजस्थानी जन के मन का रोष विस्फोट के रूप में प्रकट हुआ। कवि का यह मानना था कि आजादी की इस लड़ाई का अवसर चूक गए तो फिर यह अवसर मिलना बड़ा मुश्किल है-

'आयो अवसर आज प्रजा पख पूरण पाळण।
आयौ अवसर आज गरब गोरां रौ गाळण।'

कवि का यह मानना है कि आजादी सबसे बड़ी नियामत है और उसे बचाए रखना हर नागरिक का कर्त्तव्य। वे अंग्रेजों की नीति को समझ गए थे और इसी कारण उस नीति से देश को बचाने के लिए उन्होंने एकजुट संघर्ष की आवश्यकता पर बल दिया। सूर्यमल्ल मिश्रण और शंकरदान सामौर एक ही समय में जन्म लेने वाले और जीने वाले कवि थे। दोनों ने ही राष्ट्रीयता की भावना को अपनी कविता का आधार बनाया। अंग्रेजों के अत्याचार की नीति का विरोध कर शंकरदान सामौर ने ऊंचे सुर में देश की एकता, जातियों की एकता और धर्मों की एकता की आवाज बुलंद की। संकट काल में सभी तरह के भेदों को दूर करने की जरूरत बताते हुए कवि राजाओं और की बजाय लोक को संघर्ष का आह्वान करता है-

'धरा हिंदवाण री दाब रह्या दगै सूं, प्रगट में लड़्यां ही पार पड़सी।
संकट में एक हुय भेद मेटो सकल, लोक जद जोस सूं जबर लड़सी।।
मिळ मुसळमान रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छंड जबर जुड़सी।
दौड़सी देस रा दबियोड़ा दाकल कर, मुलक रा मीठा ठग तुरत मुड़सी।।'

उनकी खारी लेकिन खरी आवाज देश के दबे हुए लोगों को ऊपर उठाने के लिए थी। कवि किसान को भी इस युद में साथ लेता है। किसानों का ये साथ उत्पादन का है। आजादी की लड़ाई में किसानों एवं काम करने वाले मजदूरों को साथ लेने का क्रान्ति संदेश इससे पहले राजस्थानी साहित्य में कहीं दिखाई नहीं देता। जैसा कि कवि ने कहा है-

'नवो नित धान करसाण निपजावसी,
तो पावसी फतै हिंदवाण पक्की।।'

कवि यह जान गया था कि सब लोगों के संगठित होने से ही देश को आजाद करवाया जा सकता है। तांत्या टोपे, झांसी की रानी, आउवा के ठाकुर खुशालसिंह और भरतपुर के जाट राजा तो उनकी कविता के विषय बने ही पर उनके साथ सामाजिक चेतना जगाने वाले भाव प्रकट करने में भी उनकी कलम पीछे नहीं रही।
भरतपुर राजा की प्रशंसा में उनका गीत आज भी लोक प्रचलित है-

'गोरा हटजा भरतपुर गढ़ बांको
नहं चलैला किले माथै बस थांको।
मत जाणीजै लड़ै रै छोरो जाटां को
औ तो कंवर लड़ै रै दसरथ जांको।।'

देश की भूख मिटाने वाले किसान और रक्षा करने वाले वीर सैनिक के सम्मान में वह कहता है-

'धिन झंपड़ियां रा धणी, भुज थां भारत भार।
हो थे ही इण मुलक रा, सांचकला सिणगार।।'

इस तरह आजादी की अलख जगाने वाले इस कवि ने अपना सारा जीवन लोगों को क्रांति-संदेश देने में लगाया। अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को अंग्रेजों की स्वार्थ भरी, कुटिल, लूट-खसोट जैसी चालों से सावचेत किया। इस कवि की कविता का केन्द्र कोई गढ़ या गढ़पति नहीं रहा, वह तो अपनी कविता में शोषितों की तरफदारी करता रहा। इनकी रचनाएं आमजन की पीड़ा के दस्तावेज हैं। कवि सामौर ने अपनी इन रचनाओं के माध्यम से देश की दुर्दशा को प्रकट कर अपने कविधर्म को निभाया। १० अप्रैल १८७८ ईस्वी को इस संघर्षशील कवि का देहांत हो गया, मगर उनकी रचनाओं के बल पर उनका यश हमेशा जीवित रहेगा।

प्रस्तुति- अजय कुमार सोनी

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सोमवार, 17 नवंबर 2008

बटोड़ां में मोर बोलै छै..........................

परलीका गांव में बरसों बाद फिर से मोर दिखने लगे हैं। खेतों में, चौगानों में और बाड़े-बटोड़ों में खेलते-कूदते मोरों का झुंड ग्रामीणों को बरबस ही आकर्षित कर लेता है। मोरों के ये झुंड गांव के वातावरण को सरस बना रहे हैं।

'जनवाणी` के फोटोग्राफर विक्रम गोदारा (गोदारा डिजिटल स्टूडियो) ने ये फोटो खास तौर से खीचा है।

रिपोर्टर- अजय कुमार सोनी (संपादक जनवाणी)

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गुरुवार, 13 नवंबर 2008

कविता-कड़बी काटतो, धरग्यो दांती पांथ..................


परलीका में सेठियाजी की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित परलीका, १३ नवम्बर
सेठियाजी व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों दृष्टियों से राजस्थानी ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य के गौरव थे। वे निस्संदेह बड़े कवि थे तथा बड़ा कवि कई युगों से कोई एक पैदा होता है। उन्होंने अपनी कविता में राजस्थान का कोई कोना अछूता नहीं छोड़ा। राजस्थान को उन्होंने समग्र रूप में चित्रित किया। वे बेजोड़ कवि थे। सेठिया के रूप में हमने राजस्थान की धरती पर साहित्य की तलवार से लड़ने वाले बहुत बड़े योद्धा को खो दिया है। ये उद्गार बुधवार को हनुमानगढ़ जिले के परलीका गांव में जनकवि कन्हैयालाल सेठिया की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने व्यक्त किए। ग्राम की साहित्यिक संस्थाओं व राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय की राष्ट्रीय सेवा इकाई के संयुक्त तत्वावधान में बालिका विद्यालय के प्रांगण में आयोजित इस सभा में बड़ी संख्या में साहित्यकार, साहित्य-प्रेमी, राजस्थानी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता तथा विद्यार्थी शामिल हुए। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने सेठियाजी के चित्र के समक्ष पुष्प अर्पित किए तथा दो मिनट का मौन रखा। कथाकार मेहरचंद धामू ने कहा कि सेठियाजी ने कविता के माध्यम से राजस्थान की भाषा, संस्कृति, प्रकृति और इतिहास को दुनिया के समक्ष रखा। अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रदेश प्रचार मंत्री विनोद स्वामी ने कहा कि सेठियाजी का राजस्थानी को मान्यता का सपना अधूरा रह गया और इस सपने को पूरा करने में राजस्थान का नौजवान पीछे नहीं रहेगा। इस अवसर पर विद्यार्थी सुभाष स्वामी ने सेठियाजी के दोहे, नीलम चौधरी ने गद्य कविताएं 'गळगचिया`, सुनीता कस्वां ने कविता 'राजस्थानी भाषा`, संज्या बिरट ने 'कुण जमीन रो धणी`, नूतन प्रकाश ने 'जलमभोम`, राजबाला खर्रा ने 'धरती धोरां री` व पूनम बैनीवाल ने 'पातळ`र पीथल` आदि कविताओं का भावपूर्ण वाचन किया। इस अवसर पर कवि किसान ने अपने दोहों के माध्यम से काव्यांजलि दी, 'सायर सुरग सिधारियो, रोया भर-भर बांथ, कविता-कड़बी काटतो, धरग्यो दांती पांथ।` व्याख्याता सत्यनारायण सोनी ने संचालन के दौरान सेठियाजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला तथा उनकी कविताओं के उदाहरण प्रस्तुत किए, 'बुझसी धूणी देह री, अबै हुवै परतीत, पण आभै में गूंजता, रैसी म्हारा गीत।` इस अवसर पर राजस्थानी मोट्यार परिषद् के बीकानेर संभाग उपाध्यक्ष सतपाल खाती, जिला महामंत्री संदीप मईया, सुरेन्द्र बैनीवाल, बुजुर्ग जीतमल बैनीवाल, व्याख्याता जगदीश प्रसाद इंदलिया, राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी पूर्णमल सैनी, बसंत राजस्थानी, हनुमान खोथ व किशनाराम कल्याणी सहित कई वक्ताओं ने विचार रखे। उपस्थित जन-समुदाय ने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने का संकल्प लिया।



सेठियाजी की सैकड़ों कविताएं कंठस्थ
सेठियाजी की कविताओं की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि परलीका के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय की बारहवीं कक्षा में अध्ययनरत छात्रा पूनम बैनीवाल को उनकी सैकड़ों कविताएं, गीत और दूहे कंठस्थ हैं। पूनम को राजस्थानी के अन्य कविओं की कविताएं भी बड़ी संख्या मंे कंठस्थ हैं। सेठियाजी की 'पातळ`र पीथळ`, 'धरती धोरां री`, 'राजस्थानी भाषा` जैसी लम्बी कविताएं भी वह बेहिचक व बिना अटके, धाराप्रवाह और ओजपूर्ण में अंदाज में प्रस्तुत करती है।

प्रस्तुति :- अजय कुमार सोनी परलीका मो - ९६०२४-१२१२४, ९४६०१-०२५२१

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मंगलवार, 11 नवंबर 2008

पण आभै में गूंजता रैसी म्हारा गीत.....................

पण आभै में गूंजता रैसी म्हारा गीत......





जन-जन रा कवि, सबद रिसी, राजस्थानी माटी रा साचा गायक, महान कवि, पद्मश्री कन्हैया लाल सेठिया नीं रैया। आज तारीख ११ नवंबर २००८ नै दिनूगै करीब ६ बजे कोलकाता में आपरै निवास पर वां छेकड़ली सांस ली। वां रो एक दूहो है :-



''बुझसी धूणी देह री, अबै हुवै प्रतीत।
पण आभै में गूंजता रैसी म्हारा गीत।।"



जद तांई आ धरती रैसी, वां रा गीत गूंजता रैसी। सेठिया जी फगत राजस्थानी रा ई नीं, भारतीय साहित्य रा लूंठा कवि हा। राजस्थानी कविता रै मार्फत राजस्थान री संस्कृति अर प्रकृति री खासियतां दुनिया रै सांमी राखण में कामयाब हुया। सगळां सूं बेसी पढ़ीजण-सुणीजण वाळा कवि हा बै। 'धरती धोरां री', पातळ अर पीथल', 'जलमभोम', 'कुण जमीन रो 'धणी' जिसी कवितावां आज भी लोकगीतां री भांत गायी जावै। राजस्थानी में वां १४ किताबां लिखी जिणमें 'रमणियां रा सोरठा', 'गळगचिया', 'मींझर', 'मायड़ रो हेलो', 'लीकलकोळिया', 'लीलटांस' अर 'हेमाणी' आद खास है। मायड़ भासा राजस्थानी री मानता वास्तै बै आखै जीवण संघर्ष करता रैया। मायड़ भासा रै सम्मान में वां रो दूहो है :-,


''मायड़ भासा बोलतां, जिण नै आवै लाज।
इसै कपूतां सूं दुखी, आखो देस-समाज।।"

हिन्दी, अंग्रेजी अर उर्दू में भी वां री मोकळी पोथ्यां छपी है। सेठिया जी नै सरधांजली देवतां थकां श्री रामस्वरूप किसान कैयौ है,

''आज आपां राजस्थान री धरती पर साहित्य री तलवार सूं लड़ण आळो भोत बड़ो जोधो खो दियो।" किसान जी रो दूहो है :-

''सायर सुरग सिधारियो, रोया भर-भर बांथ।
कविता-कड़बी काटतो, धरग्यो दांती पांथ।।"

जनवाणी परिवार कानीं सूं परलीका में सरधांजली सभा १३ नवंबर नै राखी है। पधारज्यो सा!

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शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

नेता बैठ्यो ताकड़ी, चमचा घालै बाट...............


काचा रैग्या रोट (रामस्वरूप किसान)



नेता बैठ्यो ताकड़ी, चमचा घालै बाट।
परजा देखै बापड़ी, बां लोगां रा ठाठ।।
तोलो करतब-ताकड़ी, नेतावां नै घाल।
तोलो क्यूं उण ताकड़ी, जिण में तूलै माल।।
नेताजी इक पालड़ै, दूजै सिक्कां-बो`ळ।
मिनख तुल्यो कै मिनखपणो, होगी रोळ-गिदोळ।।
तूल्यो नेता ताकड़ी, सिक्कां कई हजार।
बोझ बतायो मांस रो, नईं गुणां रो भार।।
मन काळो तन ऊजळो, कोनी मूंढै काण।
सिर पर गंठड़ी झूठ री, नेतावां पैचाण।।

मिंदर संग मसीत नैं, लड़ा न आई लाज।
करणो चावै मिनखड़ा! लासां ऊपर राज।।

टूटै सारो देसड़ो, बोट न टूटै एक।
नेतां री इण नीत सूं, सायब राखै टेक।।

मिनख मिनख रै बीच में, मत चिण भाया! भींत।
वोतान खातर बावळा! माड़ी कदे न चींत।।

मिनख बोट नै बोट ले, ओ है एक कळंक।
आछो होवै सौ गुणो, बीं राजा सूं रंक।।

लासां माथै बोट ले, हरख्या नेता जीत।
परजा आंगण पीटणो, बां रै आंगण गीत।।

मत मत दे उण लीडरां, जिणां गई मत मार।
उण हार्यां जग जीतसी, उण जीत्यां जग हार।।

रैयत मांगै रोटड़ी, राजा देत चुणाव।
फूंक तेल द्यै तेलड़ो, कीकर हुवै बचाव।।

आं कारां में बावळा! बळै कमेरो खून।
स्याणो माणस नीं चढै, चढै मारियो पून।।

नेतां लीन्यो फैसलो, गोळ ढाळ नै मेज।
गेरो फूट समाज में, बण ज्याओ अंगरेज।।

कुरसी खातर देस में, नित बाजै है जूत।
आतंक नाचै देस में, दिल्ली नाचै भूत।।

लासां ऊपर गीध ज्यूं, गद्दी ऊपर आज।
पूत लड़ै इण देस रा, कोनी आवै लाज।।

नेता नोचै मांस ने , सेठां काढै खाल।
मरग्यो म्हारो देसड़ो, लुटै मुसाणां माल।।

झटका देख चुणाव रा, देख चुणावां भेस।
लाठी बाजै देस में, लूटण खातर देस।।

परमट बांटै लूट रा, साल पांचवैं लोग।
हाथ जिकै रै लागज्या, बो ही भोगै भोग।।

नेता मांगै बोटड़ा, जोड़-जोड़ नै हाथ।
बोट नईं ऐ लूट रा, परमट मांगै स्यात।।

इबकै-इबकै बेलियो, ओरूं देद्यो बोट।
पांच साल में नईं सिक्या, काचा रै`ग्या रोट।।

नेता मांग्या बोटड़ा, थूक पान री पीक।
म्हूं के कम हूं लूट में, बो के लूटै ठीक।।

लाखूं अठै गरीब घर, गया बाढ में डूब।
नेतावां श्रधान्जली, मदद करैली खूब।।

बै देवै श्रधान्जली, म्हे मांगां इमदाद।
सभा करै बै सोक री, म्हे होवां बरबाद।।

नेता निरखै झ्याज चढ, बाढ डूबिया गांव।
पै`लै पानै आयसी, अखबारां में नांव।।

काढ्यो तेल किसान रो, बाती बण्यो मजूर।
दोनूं बळ दीपावळी, करै अंधारो दूर।।

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परलीका की प्रतिभा...................

लक्ष्मीनारायण खाती- श्री अमरसिंह खाती के सुपुत्र श्री लक्ष्मीनारायण खाती का केन्द्रीय विद्यालय संगठन के पीजीटी कैमिस्ट्री (व्याख्याता- रसायन विज्ञान) के लिए चयन हुआ है। आपकी नियुक्ति त्रिपुरा राज्य के अगरतला में हुई है। मिलनसार और मृदुभाषी श्री खाती रसायन विज्ञान में एमएससी और बीएड हैं।
जनवाणी परिवार की ओर से हार्दिक बधाई।

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सोमवार, 3 नवंबर 2008

राजेश चड्ढा की गजले..................

बुल्ले शाह सी यारी रखता हूँ
नानक खुमारी रखता हूं
मीरा के तन मन कृष्ण मैं
सूरत तुम्हारी रखता हूं
अपना फरीदी वेश है
दरवेश दारी रखता हूं
चादर कबीरी जस की तस
खातिर तुम्हारी रखता हूं
ईसा सी माफी दे सकूं
कोसिस ये जारी रखता हूं
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फिर उनको देखा तो आंखें भरी है
अभी तो पुरानी ही चोटें हरी हैं
हमसे तो लफजों का बयान मुश्किल
तेरा लब हिलाना ही शायरी है
उसने कहा था कि बातें खत्म हैं
जला दो ये जितनी किताबें धरी हैं
किस्सा नहीं है ये इल्म-ओ-अदब
कभी तुमने अपनी हकीकत पढ़ी है।
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राजेश चड्ढा (वरिष्ठ उद्घोषक, आकाशवाणी सूरतगढ) कानाबाती- ९४१४३८१९३९

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2008

निरालो निजरानो..................






परलीका
रा राजू खी
चड़ गांव रा साहित्यकार अर मायड़ भाषा आन्दोलन रा कार्यकार्तावा ने रे मोके निरालो निजरानो भेंट करयो। राजू खीचड़ एक खेती खड़ नौजवान है अर राजस्थानी मोट्यार परिसद रा जुझारु कार्यकर्ता है। आप दिवाळी रे मोके एक दर्जन अराई अर इतनी ही उकसनी निजराने रे रू
में बाँट'र सगळा रो दिल जीत लियो।



ानकारी
- अराई
अर उकसनी दोनू ही बिलोवने सू जुड्या संज है। अराई सिनिये री गूंथी जावे अर कधावनी बिलोनो आद ठाम टिका'र मेलन रे काम आवे। उकसनी दचाभ री जड्या सू बना जावे। ओ एक तरिया रो ब्रश बन जावे अर कधावनी बिलोनो आद ठाम साफ़ करने रे काम आवे।

==== ओ दुनिया रो न्यारो-निरालो निजरानो है इन में राजस्थानी माट्टी री महक है। इन निजराने रे सामी दुनिया रा सगळा निजराना फीका है।====
==== चंद्रपति देवी (बडेरी लुगाई) ====

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सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

दिवाली री मोकळी-मोकळी बधाई.....

आपरे घर में सुख शान्ति रो बासो हुवे।
अन्न धन्न रा भंडार भरे।
धन्न धीनो धान मोकलो बापरे।
सातु सुख बापरे।
दिवाळी री मोकळी-मोकळी बधाई।

जनवाणी परिवार कानी सु दिवाळी री मोकळी-मोकळी बधाई।

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रविवार, 19 अक्टूबर 2008

परलीका में पेयजल संकट...........बिक रहा है पानी













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